नई बिजली दरें तय करने की प्रक्रिया शुरू
उत्तर प्रदेश स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर (यूपीएसएलडीसी) के वार्षिक राजस्व आवश्यकता प्रस्ताव (एआरआर) पर सुनवाई के साथ ही बुधवार को बिजली की नई दरें तय करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। नियामक आयोग सभागार में हुई सुनवाई में बिजली की कम मांग बताकर उत्पादन इकाइयों को बंद किए जाने का मुद्दा उठा।
नियामक आयोग सभागार में बुधवार को अध्यक्ष अरविंद कुमार और सदस्य संजय कुमार सिंह की उपस्थिति में सुनवाई शुरू हुई। प्रक्रिया शुरू होते ही सुनवाई के ऐन पहले तक याचिका सार्वजनिक न किए जाने का सवाल उठा। इसके बाद प्रदेश में रोस्टर व्यवस्था लागू रहने के लिए उत्पादन इकाइयों को बंद किए जाने की बात उठी। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष और राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि कम बिजली मांग का हवाला देते हुए उत्पादन इकाइयों को बंद किया जाना अनुचित है। रोस्टर व्यवस्था लागू होने से बिजली की मांग कम हुई है। यूपी एकमात्र राज्य है जहां रोस्टर व्यवस्था लागू है।
अगर रोस्टर में ग्रामीण क्षेत्रों को 18 घंटे के बजाय और कम समय के बिजली दी जाए तो बिजली की मांग स्वत: और कम हो जाएगी।यह उचित नहीं ह। केंद्र सरकार के कंज्यूमर राइट रूल-2020 के तहत शहरी और ग्रामीण सभी उपभोक्ताओं को 24 घंटे बिजली मिलने का अधिकार दिया है।
सुनवाई के दौरान कंज्यूमर राइट रूल के प्रावधानों को आधा-अधूरा लागू करने का भी मामला उठा। यह कहा गया कि जो प्रावधान उपभोक्ताओं पर वित्तीय बोझ डालते हैं, केवल वही लागू किए गए हैं। सुनवाई में ट्रांसमिशन व यूपीएसएलडीसी के प्रबंध निदेशक मयूर माहेश्वरी सहित सभी एमडी उपस्थित रहे। उन्होंने भी अपने पक्ष में प्रेजेंटेशन दिया।
आंकड़ों पर उठे सवाल
सुनवाई में यूपीएसएसडीसी के आंकड़ों पर भी सवाल उठे। वर्ष 2026-27 के लिए एआरआर 51 करोड़ 50 लाख दिखाया गया है। इसमें नियामक आयोग द्वारा पहले से ही अनुमोदित वर्ष 2024-25 का 23 करोड़ 81 लाख रुपये जोड़ दिया गया है। उपभोक्ता परिषद ने कहा कि यूपीएसएलडीसी का वास्तविक एआरआर 27 करोड़ ही होना चाहिए। उपभोक्ता परिषद के सवाल पर नियामक आयोग अध्यक्ष अरविंद कुमार ने टिप्पणी की कि पहली बार किसी याचिका में इतनी खामियां हैं। यह गंभीर मामला है। यूपीएसएलडीसी इसे सही करे। यहां यूपीएसएलडीसी को स्वतंत्र इकाई बनाने की मांग फिर की गई। आयोग पहले ही इसके आदेश जारी कर चुका है।