UP News : बेसिक शिक्षा विभाग के अफसरों को मनमानी की आदत, हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

UP News : बेसिक शिक्षा विभाग के अफसरों को मनमानी की आदत, हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली पर सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि उन्हें मनमाने ढंग से काम करने की आदत है। अधिकारी याचियों को परेशान करने के लिए जानबूझकर कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं ।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्हें मनमाने ढंग से काम करने की आदत है। अधिकारी याचियों को परेशान करने के लिए जानबूझकर कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं करते हैं। कोर्ट ने यह टिप्प्णी 2018 के आदेश का अब तक पालन नहीं करने पर की। साथ ही कहा कि यदि 2018 के आदेश का पालन नहीं किया जाता तो अगली सुनवाई पर अपर मुख्य सचिव, प्रधान सचिव बेसिक शिक्षा और राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के निदेशक को कोर्ट में उपस्थित होना होगा।

यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने उज्जमा व एक अन्य की याचिका पर दिया है। रामपुर की याची उज्जमा व चेतना सैनी 2011 में प्रशिक्षु शिक्षक भर्ती में शामिल हुई थीं। जाति प्रमाण पत्र में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए बेसिक शिक्षा विभाग ने उन्हें नियुक्ति पत्र देने से मना कर दिया। इसे याचिका में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने 2018 के आदेश से याचियों के पक्ष में आदेश दिया लेकिन आदेश का पालन नहीं किया गया। इस पर याचियों दोबारा याचिका दाखिल की।

हाईकोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताई कि बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने 2018 के आदेश का पालन करने का इरादा ही नहीं दिखाया। इसकी बजाय उन्होंने 2019 में अनंतिम नियुक्ति पत्र पेश कर दावा किया कि आदेश का पालन हो गया है। कोर्ट ने इस कृत्य को न्यायालय को गुमराह करने वाला माना। साथ ही कहा कि याचियों को नियुक्ति पत्र जारी करने के कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद उन्हें परेशान किया गया और उन्हें दो बार अवमानना याचिकाएं और तीन रिट याचिकाएं करने के लिए मजबूर किया गया।

हाईकोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताई कि बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने 2018 के आदेश का पालन करने का इरादा ही नहीं दिखाया। इसकी बजाय उन्होंने 2019 में अनंतिम नियुक्ति पत्र पेश कर दावा किया कि आदेश का पालन हो गया है। कोर्ट ने इस कृत्य को न्यायालय को गुमराह करने वाला माना। साथ ही कहा कि याचियों को नियुक्ति पत्र जारी करने के कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद उन्हें परेशान किया गया और उन्हें दो बार अवमानना याचिकाएं और तीन रिट याचिकाएं करने के लिए मजबूर किया गया।

रेप मामले में रूटीन तरीके से नहीं होना चाहिए डीएनए टेस्ट

उधर, एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि दुष्कर्म पीड़िता के बच्चे के पितृत्व का पता लगाने के लिए डीएनए टेस्ट रूटीन तरीके से नहीं कराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता और उसके बच्चे के डीएनए परीक्षण के गंभीर सामाजिक परिणाम हो सकते हैं इसलिए रूटीन में ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। बाध्यकारी और अपरिहार्य परिस्थितियां व ठोस आधार होने पर ही अदालत डीएनए जांच करा सकती है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव मिश्र ने गाजीपुर निवासी रामचंद्र राम की याचिका खारिज करते हुए दिया है।

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