12 साल काम किया तो नौकरी पक्की! सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय 

12 साल काम किया तो नौकरी पक्की! सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय 

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने कर्मचारियों के हक में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी से लंबे समय तक काम लिया जाता है, तो वह कार्य स्थायी माना जाएगा। शीर्ष अदालत के अनुसार, इतनी लंबी सेवा ही इस बात का प्रमाण है कि उस पद पर नियमित नियुक्ति की जरूरत थी। न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला रद्द कर दिया है। कोर्ट ने प्रभावित कर्मचारियों को वापस नौकरी पर रखने का आदेश दिया है। यह मामला कानपुर नगर निगम के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों से जुड़ा है। ये कर्मचारी वर्ष 1993 से 2006 तक लगातार काम कर रहे थे।

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अदालत ने कहा कि जब कोई 12-13 साल तक लगातार कार्य करता है, तो उसे अस्थायी कहना गलत है। ऐसे में कर्मचारी को अचानक नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। पीठ के अनुसार, इतनी लंबी कार्यावधि सिद्ध करती है कि वह काम स्थायी था और नियमित पद मौजूद था। इस कानूनी लड़ाई में सबूतों को लेकर अहम मोड़ आया। नगर निगम ने कर्मचारियों की उपस्थिति का रिकॉर्ड पेश नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने श्रम न्यायालय के निर्णय को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि यदि संस्थान आदेश के बावजूद दस्तावेज नहीं दिखाता, तो कर्मचारी का दावा सही माना जाएगा। कानून इसे प्रतिकूल अनुमान कहता है।

बहाली का आदेश जारी, वेतन पर दोबारा विचार

सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों की बहाली का आदेश बरकरार रखा है। हालांकि, उनके पिछले बकाया वेतन पर एक तकनीकी पेंच है। अदालत का मानना है कि यह देखना जरूरी है कि नौकरी से हटने के बाद कर्मचारियों को और काम कहां मिला या नहीं। इसी बिंदु पर निर्णय के लिए मामला पुनः उच्च न्यायालय भेज दिया गया है। इस फैसले से देशभर के संविदा कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलेगी।

जमीन विवादों के लिए राजस्व न्यायिक सेवा की मांग, याचिका दायर

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में कहा गया है कि गैर-न्यायिक कानूनी पेशेवर जमीन संबंधी विवादों का निपटारा कर रहे हैं। ऐसे मामलों के निपटारे के लिए राजस्व न्यायिक सेवा स्थापित की जाए। याचिका में यह भी मांग की गई है कि इन मामलों के निपटारे के लिए सरकारी कर्मचारियों के लिए न्यूनतम कानूनी योग्यता और प्रशिक्षण मॉड्यूल निर्धारित किए जाएं। वकील अश्विनी उपाध्याय ने याचिका में दलील दी कि करीब 66% दीवानी मामले जमीन विवादों से जुड़े होते हैं। इनकी मुख्य कमी यह है कि मामलों का निपटारा गैर-न्यायिक अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है, जिनके पास औपचारिक कानूनी शिक्षा या प्रशिक्षण का अभाव है। परिणामस्वरूप गलत और असंगत निर्णय सामने आते हैं। सुप्रीम कोर्ट 2 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई कर सकता है।

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संपत्ति अधिकारों को लेकर अनिश्चितता

याचिका में कहा गया है कि इससे संपत्ति के अधिकारों को लेकर लंबे समय तक अनिश्चितता बनी रहती है। जमीन के उपयोग और हस्तांतरण पर रोक लगती है, मुकदमों और खर्चों में बढ़ोतरी होती है तथा न्याय तक प्रभावी पहुंच में बाधा आती है। साथ ही यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। याचिका में केंद्र और राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे राजस्व अधिकारियों के लिए न्यूनतम कानूनी योग्यता और न्यायिक प्रशिक्षण मॉड्यूल निर्धारित करें।

वेदांता की जेपी एसोसिएट्स के लिए अदाणी की बोली को सुप्रीम चुनौती

नई दिल्ली। खनन क्षेत्र की दिग्गज कंपनी वेदांता लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर जयप्रकाश (जेपी) एसोसिएट्स के अधिग्रहण के लिए अदाणी समूह की 14,535 करोड़ रुपये की बोली को चुनौती दी है। वेदांता ने शीर्ष अदालत से नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वेदांता ने 25 मार्च को अपनी अपील दाखिल की। कंपनी ने कहा कि एनसीएलएटी ने कंपनी के ऋण पुनर्गठन और योजना के कार्यान्वयन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। वहीं, अदाणी एंटरप्राइजेज ने भी सुप्रीम कोर्ट में एक कैविएट दायर कर वेदांता की याचिका पर कोई भी आदेश पारित करने से पहले सुनवाई का अनुरोध किया है।

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